रविवार, 12 जनवरी 2014

**स्वामी विवेकानन्द**

                                                                                 
आज स्वामी विवेकानन्द जी का 151 वां जन्मदिवस है, यह दिन युवा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है .... !!

स्वामी विवेकानन्द {12 जनवरी, 1863/4 जुलाई-1902} वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे, उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था .... उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासम्मेलन में सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था, भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की उपरोक्त वक्तृता के कारण ही पहुँचा .... उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है .... वे रामकृष्ण परमहंस देव जी के सुयोग्य शिष्य थे .... !!

एक बार किसी ने स्वामीजी से पूछा कि समस्त अध्यात्म का सार क्या है .... इस पर स्वामीजी ने सहज भाव से उत्तर दिया :~~

भला करो, भले बनो .... !!

उनका कहना था कि अगर तुम्हें वेद, पुराण, उपनिषद एवँ किसी भी धार्मिक ग्रन्थ पर भरोसा नहीं है तो तुम्हें इसका पूरा अधिकार है ऐसा करने का लेकिन सत्य की खोज तो जारी रहनी चाहिए और एक बार सत्य को जान लेने पर उसको स्वीकार करने में तनिक भी सँकोच अथवा विलम्ब नहीं होना चाहिए .... !!

क्या ही अच्छा हो यदि हम-आप-सभी आज देश एवँ समाज की भलाई के लिए कोई संकल्प लें और उसे पूरा करने का प्रयत्न आज से ही प्रारम्भ करें .... !!

प्रस्तुत है स्वामीजी द्वारा दिया गया विश्वप्रसिद्ध "शिकागो~वक्तृता" :~~

अमेरिकी बहनों और भाइयों,

आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा ह्रदय अपार हर्ष से भर गया है. मैं आपको आपको दुनिया के सबसे पौराणिक भिक्षुओं की तरफ से धन्यवाद देता हूँ. मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूँ और मैं आपको सभी जाति-सम्प्रदाय के लाखों-करोड़ो हिन्दुओं की तरफ से धन्यवाद देता हूँ. मेरा धन्यवाद उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मँच से यह कहा है कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदरू पूरब के देशों से फैला है. मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक~स्वीकृति{universal acceptance} का पाठ पढाया है. हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं. मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूँ जिसने इस धरती के सभी देशों के सताए गए लोगों को शरण दी है. मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने ह्रदय में उन इस्राइलियों की शुद्धतम स्मृतियाँ बचा कर रखी हैं, जिनके मन्दिरों को रोनों ने तोड़-तोड़ कर खँडहर बना दिया, और तब उन्झोने दक्षिण-भारत में शरण ली. मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ बढ़ावा दे रहा है. भाइयों मैं आपको एक श्लोक कि कुछ पंक्तियाँ सुनाना चाहूँगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ो लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है. जिस तरह से विभिन्न धाराओं कि उत्पत्ति विभिन्न स्रोतों से होती है उसी प्रकार मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है, वो देखने में भले सीधा या टेढ़े-मेढ़े लगे पर सभी भगवान तक ही जाते हैं .... !!

वर्तमान सम्मलेन, जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, स्वयँ में गीता में बताये गए एक सिद्धांत का प्रमाण है, जो भी मुझ तक आता है, चाहे किसी भी रूप में, मैं उस तक पहुँचता हूँ, सभी मनुष्य विभिन्न मार्गों पे संघर्ष कर रहे हैं जिसका अंत मुझ में है. सांप्रदायिकता, कट्टरता, और इसके भयानक वंशज, हठधर्मिता लम्बे समय से प्रथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं. इन्होने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, कितनी बार ही ये धरती खून से लाल हुई है, कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और कितने देश नष्ट हुए हैं .... !!

अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता. लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है, मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिता, हर तरह के क्लेश, चाहे वो तलवार से हों या कलम से, और हर एक मनुष्य {जो एक ही लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हैं} के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा .... !!

{स्वामी विवेकानन्द को अमेरिका और यूरोप में हिंदुत्व के प्रचार-प्रसार और Ram Krishna Mission की स्थापना के लिए हमेशा याद रखा जायेगा. हम ऐसे महान योगी को शत-शत नमन करते हैं}

      
                                                                                 

2 टिप्‍पणियां:

  1. विस्तृत आलेख ... इतिहास की अच्छी जानकारी ... बधाई ...

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  2. अत्यन्त ही सामयिक आलेख, साझा करने हेतु धन्यवाद.

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